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हरि हर मिलन के बाद भगवान महाकाल को तुलसी माला अर्पित
ज्योतिर्लिंग का हिमालय की तरह किया गया श्रंगार
उज्जैन। वैकुंठ चतुर्दशी पर बुधवार-गुरुवार की मध्यरात्रि को हरिहर मिलन पूरा हुआ। गुरुवार को सुबह गोपाल मंदिर से महाकालेश्वर के लिए आई तुलसी की माला और भस्मआरती में भगवान महाकाल को तुलसी के पत्ते चढ़ाए गए। अर्पित किए गए। हरि को सत्ता सौंपने के बाद माना जाता है कि महाकालेश्वर आज से हिमालय पर चले जाते हैं, इसलिए उनका हिमालय स्वरूप श्रंगार किया गया।रुद्राक्ष की मालाएं पहनाई गई। गर्भगृह को फूलों से सजाया गया।
हरिहर मिलन में गुरुवार को भगवान महाकाल हरि से मिलने कार्तिक माह की वैकुंठ चतुर्दशी को गोपाल मंदिर पहुंचे। फूलों से सजी पालकी में महाकाल चंद्रमौलेश्वर स्वरूप को विराजमान किया गया। कलेक्टर और एसपी ने रात 11 बजे महाकाल की सवारी को खुद अपने कंधों पर उठाकर गोपाल मंदिर के लिए रवाना किया। भारी संख्या में श्रद्धालु भी मौजूद रहे। सवारी निकलने के पहले भगवान महाकाल मंदिर के सभामंडल में पूजन किया गया। इसके बाद पालकी में बैठाकर मंदिर के लिए सवारी रवाना हुई।
सवारी मार्ग में कई जगह आतिशबाजी
सवारी के आगे पुलिस बैंड धुन बजाते हुए चले। सवारी महाकाल चौराहा, गुदरी बाजार, पटनी बाजार होते हुए गोपाल मंदिर पहुंची। रास्ते में जगह-जगह पुष्प वर्षा कर बैंड-बाजे व ढोल बजाए गए। इस दौरान भगवान कृष्ण व महाकाल के जयकारे लगते रहे। कई जगह आतिशबाजी भी की गई। गोपाल मंदिर पहुंचने पर पालकी का मंदिर की ओर से स्वागत किया गया। गोपाल मंदिर और महाकाल के पुजारियों ने दोनों की पूजा-अर्चना की। फल, मेवे व प्रसाद का भोग लगाया गया। पूजा-अर्चना के बाद भगवान महाकाल वापस मंदिर के लिए रवाना हुआ।
इसलिए खास है यह सवारी
पौराणिक आख्यानों की मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक राजा बली के यहां विश्राम करने जाते हैं, इसलिए उस समय संपूर्ण सृष्टि की सत्ता का भार शिव के पास होता है। वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन हर-हरि को उनकी सत्ता का भार वापस सौंप कर कैलाश पर्वत तपस्या के लिए लौट जाते हैं। इस धार्मिक परंपरा को हरिहर मिलन कहते हैं।